बूढ़ी काकी

बूढ़ी काकी नामक वृद्धा अपनी संपत्ति अपने भतीजे पंडित बुद्धिराम को दे देती है और बदले में पालन‑पोषण का भरोसा पाती है, लेकिन बुद्धिराम व उसका परिवार उसे उपेक्षित रखते हैं और वह अक्सर भूखी रहती है। विवाह‑भोज के समय वह जूठे पत्तलों में से खाना उठाती है। बहू रूपा और नातिन लाडली को दया आती है और वे उसे प्रेम से भोजन कराती हैं। कहानी संपत्ति ले लेने के बाद बुजुर्गों की उपेक्षा और मानवीय सहानुभूति का संदेश देती है.

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