कफ़न

कामचोर चमड़िया घीसु और माधव अपनी बहू बुधिया की प्रसव‑पीड़ा की परवाह न कर आलू सेंकते रहते हैं। बुधिया की मृत्यु हो जाती है। दोनों दाह‑संस्कार के लिए गाँव से पैसे माँगते हैं लेकिन उस पैसे से शराब और भोजन कर लेते हैं। वे तर्क देते हैं कि पेट भर खाना कफ़न से ज़्यादा जरूरी है.

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