होरी महतो और उसकी पत्नी धनिया गाय का स्वप्न देखते हैं। वह पड़ोसी भोला से उधार लेकर गाय खरीदते हैं और साधु को भोजन कराने का संकल्प लेते हैं.
होरी का भाई हीरा ईर्ष्या में गाय को ज़हर दे देता है; होरी और धनिया मुआवज़ा चुकाने के लिए कर्ज़ लेते हैं, गरीबी बढ़ती है पर गोदान की आस बनी रहती है.
गोबर विधवा झुनिया से प्रेम करता है; झुनिया गर्भवती हो जाती है। पंचायत जुर्माना लगाती है और सामाजिक बहिष्कार करता है। गोबर शहर भाग जाता है; होरी-धनिया झुनिया को घर में रख लेते .
जुर्माने और सामाजिक दबाव से उनका खेत-खलिहान बिकता जाता है। होरी-धनिया झुनिया को बहू के रूप में स्वीकार करते हैं, पर कर्ज़ और बढ़ जाता है.
कथा ग्रामीण गरीबी के साथ शहरी पात्रों (राय साहब, मालती) को जोड़ती है। होरी ज़मींदार के कारिंदों की चंगुल में मज़दूर बन जाता है; शोषण और वर्ग भेद उभरते हैं.
शहर में गोबर कारखाने में काम कर कमाने लगता है और परिवार को सहारा देने की सोचता है। गाँव में होरी कर्ज़ चुकाने में जुटा रहता है और धनिया घर सम्भालती है.
झुनिया एक बेटे को जन्म देती है। धनिया पुजारी के शोषण का विरोध करती है पर स्थिति में सुधार नहीं होता; होरी बैल बेच देता है और गाय का सपना और दूर हो जाता है.
सूखा पड़ने से फसल बर्बाद होती है। होरी ज़मींदार के खेतों में बेगार करता है और महसूल वसूलने वाले कर्मचारियों को रिश्वत देता है; उसका स्वास्थ्य गिरता है.
होरी बेटी सोना की शादी के लिए दहेज़ की व्यवस्था करने को और कर्ज़ लेता है। दूसरी ओर, शहर के बुद्धिजीवी सुधार की बातें करते हैं; गाँव में गरीबी गहराती है.
गोबर बचत लेकर लौटता है और खेत छुड़ाने की सोचता है, पर होरी वह पैसा कर्ज़ और दहेज़ चुकाने में लगा देता है। यह उसका कर्तव्यबोध दिखाता है.
कर न भरने पर उस पर फिर जुर्माना लगता है; वह और अधिक मेहनत करता है। बीमारी से वह कमजोर हो जाता है और पुलिस के डर से छुपता है.
अंतिम भाग में मरणासन्न होरी एक ब्राह्मण को प्रतीकात्मक ‘गोदान’ करने के लिए फिर कर्ज़ लेता है। वह गाय का स्वप्न लिए ही मर जाता है और धनिया संघर्ष जारी रखने का संकल्प लेती है, उपन्यास किसानों के शोषण की निन्दा और उनके स्वाभिमान का चित्रण करता है.
निर्मला का रिश्ता भुवन मोहन से तय होता है पर पिता उदयभानु लाल की मृत्यु के बाद मां कल्याणी दहेज न दे पाने के कारण उसे विधुर मुंशी तोताराम से ब्याह देती है.
निर्मला नये घर में अपनापन खोजती है। वह पति के बड़े बेटे मानसाराम से मित्रता कर लेती है, जो उम्र में थोड़ा ही छोटा है। लोगों की बातें सुनकर तोताराम को संदेह होने लगता है.
शक बढ़ जाने पर तोताराम मानसाराम को होस्टल भेज देता है। मानसाराम बीमार पड़ जाता है और घर की याद में तड़पता है; निर्मला छिपकर उसे पैसे और पत्र भेजती है.
मानसाराम बीमारी और उपेक्षा से मर जाता है। तोताराम बहुत देर से अपनी भूल समझता है और निर्मला को दोष देता है। यह दुर्घटना परिवार में दरारें बढ़ा देती है.
संदेह के चलते तोताराम अपने अन्य पुत्रों जिया और सियाराम पर भी शक करने लगता है। घर में कलह बढ़ती है और निर्मला की शारीरिक व मानसिक हालत बिगड़ती है.
अंत में तोताराम को निर्मला की निष्कलंकता का एहसास होता है, परंतु बहुत देर हो चुकी होती है। निर्मला गंभीर रूप से बीमार होकर मर जाती है। कहानी दहेज प्रथा और बेमेल विवाह की बुराइयों को उजागर करती है.
चार वर्ष का अनाथ हमीद ईद के मेले में तीन पैसे लेकर जाता है। दूसरे बच्चे खिलौने और मिठाइयाँ खरीदते हैं; हमीद लालच से बचते हुए अपनी दादी अमीना के लिए चिमटा खरीदता है ताकि रोटी बनाते समय उनके हाथ न जलें। दोस्त उसका मज़ाक उड़ाते हैं, मगर दादी उसकी समझदारी और त्याग पर भाव‑विभोर हो जाती हैं.
कामचोर चमड़िया घीसु और माधव अपनी बहू बुधिया की प्रसव‑पीड़ा की परवाह न कर आलू सेंकते रहते हैं। बुधिया की मृत्यु हो जाती है। दोनों दाह‑संस्कार के लिए गाँव से पैसे माँगते हैं लेकिन उस पैसे से शराब और भोजन कर लेते हैं। वे तर्क देते हैं कि पेट भर खाना कफ़न से ज़्यादा जरूरी है.
ज्योति कहानी में विधवा बूटी अपने दिवंगत पति के कर्ज़ और गरीबी से जूझते हुए अपने बड़े बेटे मोहन पर क्रोध निकालती है; वह छोटी‑छोटी बातों पर उसे मारती है लेकिन मोहन सहनशीलता से परिवार का सहारा बनता है। अंत में बूटी को अहसास होता है कि उसका बेटा ही उसकी ‘ज्योति’ है। कहानी विधवाओं की कठिनाइयों और बच्चों की दृढ़ता को दर्शाती है.
निर्धन किसान शंकर साधु को भोजन कराने के लिए पुरोहित से सवा सेर गेहूँ उधार लेता है। वह फसल आने पर मूल से अधिक लौटाता है, फिर भी पुरोहित ब्याज और सूद पर सूद माँगता है। सात साल बाद शंकर समझता है कि उसने असली उधार से कई गुना चुका दिया है और शोषण के विरुद्ध आवाज उठाता है.
बटाईदार किसान हल्कू और उसकी पत्नी मुन्नी कम्बल के लिए पैसे जोड़ते हैं लेकिन लगान चुकाना पड़ता है। ठिठुरती रात में हल्कू बिना कम्बल के खेत की रखवाली करता है और अपने कुत्ते जबरा के साथ आग तापता है। जब नीलगाय खेत में घुसती हैं, ठंड से कांपता हल्कू उन्हें भगाने नहीं जाता और फसल नष्ट हो जाती है। सुबह मुन्नी नाराज़ होती है, लेकिन हल्कू खुश है कि अब उसे ऐसी ठंडी रातें नहीं झेलनी पड़ेंगी.
नीची जाति के जोखू और गंगी का कुआँ गंदा होने से पीने योग्य नहीं है और ठाकुर के कुएँ पर उन्हें पानी भरने नहीं दिया जाता। गंगी रात में चोरी‑छिपे ठाकुर के कुएँ से पानी भरती है, पर ठाकुर के आने की आहट से घड़ा गिर जाता है और वह डर से भाग जाती है। कहानी छुआछूत और पानी जैसे मौलिक अधिकार से वंचित करने की कुरीति की पोल खोलती है.
बिना शुल्क के नमक तस्करी करने वाले धनाढ्य पंडित अलोपीदीन को पकड़ते हैं और उसकी रिश्वत ठुकरा देते हैं। अदालत अमीर के पक्ष में जाकर वंशीधर को निलंबित कर देती है, लेकिन बाद में अलोपीदीन उनकी ईमानदारी से प्रभावित होकर उन्हें अपना मुनीम बनाता है, यह दर्शाता है कि निष्ठा अंततः पुरस्कृत होती है.
अब्बासी (अन्ना) ने सबीर और शकीरा के बेटे नसीर को पाला है। शकीरा के संदेह के कारण अब्बासी को निकाल दिया जाता है और वह हज पर जाने का निर्णय लेती है। उसके जाने के बाद नसीर गंभीर रूप से बीमार हो जाता है। सबीर मानता है कि केवल अब्बासी की ममता ही उसे बचा सकती है और स्टेशन से उसे लौटा लाता है। अब्बासी हज छोड़कर लौट आती है और बच्चे को गोद में लेते ही वह अच्छा हो जाता है। सबीर कहता है कि उसने एक जीवन बचाकर असली हज‑ए‑अकबर कर लिया.
बूढ़ी काकी नामक वृद्धा अपनी संपत्ति अपने भतीजे पंडित बुद्धिराम को दे देती है और बदले में पालन‑पोषण का भरोसा पाती है, लेकिन बुद्धिराम व उसका परिवार उसे उपेक्षित रखते हैं और वह अक्सर भूखी रहती है। विवाह‑भोज के समय वह जूठे पत्तलों में से खाना उठाती है। बहू रूपा और नातिन लाडली को दया आती है और वे उसे प्रेम से भोजन कराती हैं। कहानी संपत्ति ले लेने के बाद बुजुर्गों की उपेक्षा और मानवीय सहानुभूति का संदेश देती है.